कोरोना वायरस से तो बच जायेंगे, लेकिन भुखमरी से मर जायेंगे साहेब

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पैगाम ब्यूरोः कोरोना वायरस की महामारी को रोकने के लिए पूरे भारत को लॉकडाउन कर दिया गया है. इस दौरान लोगों को घर के अंदर रहने के लिए कहा गया है. लॉकडाउन में घर से निकलने वालों के खिलाफ पुलिस ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है, लेकिन भले ही लॉकडाउन कोरोना वायरस के खिलाफ चल रही लड़ाई में वरदान साबित होने वाला है, लेकिन यह फैसला दिहाड़ी मजदूरों के लिए जान का बवाल बन गया है. उनके ऊपर तो जैसे दोहरी मार पड़ गयी है. पहले कोरोना वायरस और अब लॉकडाउन. उनके लिए तो आगे कूंआ और पीछे खाई वाली स्थिति हो गयी है.

नोएडा में लेबर चौक पर रोजाना सैकड़ों मजदूर काम की तलाश में पहुंचते हैं, लेकिन आज यहां सन्नाटा छाया हुआ है. लॉकडाउन और कर्फ्यू के बीच भी तीन-चार मजदूर यहां नजर आ रहे हैं. किसी को देखते ही उनके चेहरे पर उम्मीद की एक किरण झलकने लगती है.

बिहार के दरभंग जिले के रहने वाले उदय प्रसाद ने कहा कि हमें पता है कि लॉकडाउन लगा हुआ है. इसलिए यहां कोई नहीं आयेगा. फिर भी एक उम्मीद के तहत हमलोग यहां आये हैं. उदय के मुताबिक उसे मजदूरी के रुप में रोजाना 600 रुपये मिलते हैं. जिससे उसका घर किसी तरह चलता है. उदय ने बताया कि मेरे घर में पत्नी और दो बच्चे हैं. रोजाना की कमाई से कुछ पैसे बचे हैं. उससे चंद दिन तो गुजर जायेंगे, लेकिन उसके बाद क्या होगा. कोरोना वायरस का तो खतरा है, लेकिन मैं अपने परिवार को भूखा नहीं देख सकता हूं.

यह सिर्फ एक रमेश कुमार या नोएडा की नहीं, देश के लाखों दिहाड़ी मजदूरों और देश के हर बड़े शहर की यह कहानी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार की रात 8 बजे देश भर में लॉकडाउन की घोषणा की, जो 21 दिनों तक चलेगा. लॉकडाउन का मतलब है, सब कुछ बंद. जिनके पास पैसे है. उन्हें जब खाने-पीने के सामान खरीदने में दिक्कत हो रही है तो फिर इन मजदूरों का क्या हाल हो रहा है, उसे अच्छी तरह समझा जा सकता है.

सरकारें मदद का एलान मदद का एलान कर रही है. लेकिन वो काफी नहीं है. क्योंकि तालाबंदी सिर्फ एक-दो दिन की नहीं है. यह 21 दिनों तक चलेगा. उसके बाद भी प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई गांरटी नहीं दी है कि 21 दिनों के बाद लॉकडाउन खत्म हो जायेगा. क्योंकि जनता कर्फ्यू के नाम पर इस लॉकडाउन की शुरूआत हुई थी, जो एक दिन से बढ़ कर अब 21 दिन तक पहुंच गयी है.

हालात आने वाले चार-पांच दिनों के बाद उस वक्त ज्यादा खराब हो जायेंगे. जब इनकी जमा पूंजी खत्म हो जायेगी और इनके पास जमा खाना-पानी सब खत्म हो जायेगा. हालांकि बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब, दिल्ली जैसी राज्य सरकारों ने मजदूरों की मदद का एलान किया है. मोदी सरकार ने भी लॉकडाउन से प्रभावित दैनिक मजदूरी करने वालों की मदद करने का वादा किया है. लेकिन यह काफी नहीं है.

भारत में दिहाड़ी मजदूर कई तरह के हैं. इनमें रिक्शा और वैन चालक, मोची, सफाई कर्मी, सिक्योरिटी गार्ड, कचरा चुनने वाले, घरों में काम करने वाले, छोटे-छोटे होटलों में काम करने वाले लाखों लोग हैं, जिनकी जिंदगी में लॉकडाउन ने अंधेरा कर दिया है.

इनमें से ज्यादातर के पास न तो बैंक अकाउंट है और न ही किसी तरह का हेल्थ कार्ड. सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर मजदूर अपने गृह राज्य से सैकड़ों किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में काम करने के लिए आये हुए हैं. वो रोजगार की तलाश में भटकत रहते हैं. इसलिए सरकार की तरफ से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को मिलने वाली सुविधाओं से यह वंचित हैं.

उत्तर प्रदेश से रोजगार की तलाश में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता आये सुफियान को कोई ढंग का काम नहीं मिला तो वो यहां रिक्शा चलाने लगे. रिक्शा और फुटपाथ ही उनकी जिंदगी है. जहां दिन भर काम करने के बाद थक कर वो सो जाते हैं. उन्हें तो पता भी नहीं है कि सरकार ने कोरोना वायरस की वजह से मुसीबत में फंसे मजदूरों की मदद का एलान किया है. उन्हें अपनी भी फिक्र नहीं है. उन्हें तो बस चिंता है कि 21 दिनों तक की तालाबंदी की वजह से गांव में उनकी बीवी और बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा. यह सोच कर उनकी नींद तक उड़ी हुई है.

भारतीय रेलवे द्वारा 31 मार्च तक सभी ट्रेन कैंसिल किये जाने की वजह से यह मजदूर घर भी नहीं लौट सकते हैं. वो तो जैसे मंझधार में फंस गये हैं. मुंबई के क्रॉफोर्ड मार्केट में काम करने वाले पश्चिम बंगाल के मालदह जिला के एकरामुल की भी यह कहानी है. दुकानदार ने अपनी दुकान बंद कर दी है और घर में बंद हो कर बैठ गया है. पिछले कई साल से उसकी दुकान में काम करने वाले एकरामुल का कोरोना वायरस और लॉकडाउन में क्या होगा. उसे उसकी कोई फिक्र नहीं है. दुकान बंद करते हुए उसने उसे 2000 रुपये दिये थे और अपना बंदोबस्त करने के लिए कहा था. अब एकरामुल को समझ में नहीं आ रहा है कि वो क्या करे और कहां जाये.

दिल्ली जामा मस्जिद इलाके में शरबत बेच कर गुजर बसर करने वाले अहमद उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले हैं. जब से लॉकडाउन हुआ है, उसके घर वाले बेहद परेशान हैं. वो हर वक्त फोन कर उनकी खैरियत पूछते रहते हैं.
ट्रेनों में लोगों के जूते पॉलिश करने साधू को तो पता ही नहीं है कि आखिर क्या हुआ है. उसे समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर ट्रेन चलना बंद क्यों हो गया और सारे स्टेशन सुनसान क्यों हो गये हैं. साधू का कहना है कि उसे कोरोना वायरस का तो पता नहीं, लेकिन यह एहसास हो रहा है कि अगर इसी तरह तालाबंदी चलती रही तो भूख जरुर उसके और उसके घर वालों की जान जरूर ले लेगी.

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