भूखे मरने से अच्छा है कि कोरोना से ही मर जायें

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पैगाम ब्यूरोः जानलेवा कोरोना वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए पूरे देश को लॉकडाउन कर दिया गया है. सरकार के आदेश के बाद लोग अपनी जान बचाने के लिए अपने घरों में कैद तो हो गये हैं, लेकिन इससे उन्हें काफी परेशानी हो रही है. खासतौर पर गरीबों और रोज कमाने और रोज खाने वालों के लिए तो कोरोना वायरस दोहरी मार साबित हुई है. सरकार राहत का एलान तो कर रही है, लेकिन लॉकडाउन के तीन दिन गुजर जाने के बाद भी लोगों को किसी भी सरकार से किसी तरह की भी मदद नहीं मिली है. लॉकडाउन से सबसे ज्यादा परेशानी दिहाड़ी मजदूर है. जिन्हें भूखमरी का सामना करना पड़ रहा है.

दिल्ली के फतेहपुर बेरी की रहने वाली राजवती भी एक दिहाड़ी मजदूर हैं. वह रोजाना मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह अपना परिवार चलाती है, लेकिन लॉकडाउन ने उनका सबकुछ छीन लिया है. लॉकडाउन की वजह से काम बंद हो गया है. जिसकी वजह से उनके लिए अपने और अपने परिवार के वास्ते खाने-पीने का जुगाड़ करना मुश्किल हो गया है. राजवती ने कहा कि हम बगैर खाना और पानी के जीने के लिए मजबूर हैं.

न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए राजवती ने कहा कि मकान मालिक किराये के लिए परेशना कर रहा है. बिजली का बिल भी देना पड़ता है. हमारे पास खाने का एक दाना तक नहीं है, हम कहां से खायेंगे. पानी आ रहा था, जिसे पीकर हम जिंदा हैं. अब वो भी बंद हो गया. उन्होंने कहा कि भूखे मरने से तो अच्छा है कि इस बीमारी (कोरोना) से मर जायें.

यह कहानी सिर्फ राजवती की नहीं है. इस स्थिति से देश के लाखों मजदूरों को गुजरना पड़ रहा है. लॉकडाउन ने उन्हें भूखमरी की कगार पर पहुंचा दिया है. बिहार की रहने वाली उमा ने कहा कि वो और उसके बच्चे दो दिनों से पानी पी कर किसी तरह जी रहे हैं.

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने मंगलवार को दिहाड़ी मजदूरों को पांच हजार रुपए देने का एलान तो किया है, लेकिन एलान होने के तीन दिन बाद भी किसी भी मजदूर को मदद का एक पैसा नहीं मिला है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह प्रवासी मजदूर हैं. देश के दूसरे राज्यों से कमाने के लिए आते हैं. इसलिए उनके पास मदद लेने के लिए जरूरी कागजात भी नहीं हैं. ऐसे में उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें

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