विदेशों में फंसे भारतीयों को लाने के लिए जहाज भेजती है सरकार, तो फिर देश में फंसे गरीबों को घर भेजने की व्यवस्था क्यों नहीं

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पैगाम ब्यूरोः देश भर में लॉकडाउन जारी है. कोरोना वायरस के खौफ से पूरा देश ठप्प पड़ चुका है. लेकिन कोरोना वायरस रोकने के लिए किया गया लॉकडाउन का फैसला उन लाखों लोगों के लिए मुसीबत बन गया है, जो अचानक किये गये लॉकडाउन के एलान की वजह से बीच रास्ते में फंस गये हैं. ट्रेन, जहाज, बस, कार सब कुछ बंद है. फलस्वरुप यह किसी भी हाल में अपने घर नहीं लौट पा रहे हैं. जिसकी वजह से इनकी हालत बेहद खस्ता हो चुकी है.

इनमें से तो बहुत सारे ऐसे लोग भी हैं, जो चार-पांच दिन से देश के विभिन्न स्टेशनों पर फंसे हुए हैं, क्योंकि अचानक लॉकडाउन की घोषणा के चलते ट्रेन बंद कर दी गयी है. इनके पास न तो खाने को कुछ है और न पीने को. भूख और प्यास से इनका बुरा हाल है. ये न घर के रहे हैं और न घाट.

सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती देख काफी लोग तो पैदल ही अपने घरों को जा रहे हैं, लेकिन वहां भी रास्ते में मुसीबत घात लगाये बैठी है. पुलिस इन मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने के बजाय उन पर जुल्म कर रही है. उनपर इस तरह से डंडे बरसाये जा रहे हैं, जैसे वो कोई अपराधी हों.

ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जब कोरोना वायरस के चलते चीन, ईरान और इटली में फंसे मालदार भारतीयों को वापस देश लाने के लिए भारत सरकार हवाई जहाज भेज सकती है तो फिर इन लाखों गरीबों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है?

लोगों पूछ रहे हैं कि क्या देश में सिर्फ अमीरों की जान की ही कीमत है. क्या गरीब इस देश के नागरिक नहीं हैं.? अमीरों को घर वापस लाने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर सकती है तो रोजी-रोटी की तलाश में अपने घरों से निकले इन गरीब लोगों का क्या कसूर है? आखिर 21 दिनों तक ये क्या करेंगे, क्या खायेंगे. कहां रहेंगे? कोई भी इस सवाल का जवाब नहीं दे रहा है.

सरकार मजदूरों की मदद के लिए धड़ाधड़ एलान कर रही है. यह अच्छी बात है, लेकिन इस देश में ऐसे भी करोड़ों लोग हैं, जो दिहाड़ी मजदूरी तो नहीं करते हैं, लेकिन उनकी हालत भी इन मजदूरों जैसी ही है. आखिर उन्हें सरकार क्या मदद देगी?

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