क्या सरकार छिपा रही है कोरोना के आंकड़े, 11 मई से बंद है प्रेस कांफ्रेंस

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पैगाम ब्यूरोः सरकार के लाख दावों और लॉकडाउन के बावजूद देश में कोरोना का कहर बढ़ता ही जा रहा है. न सिर्फ नये मामलों की संख्या में बेहतहाशा वृद्धि हो गयी है. बल्कि मरने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है. इस बीच ऐसा लग रहा है कि सरकार कोरोना के नये मामलों और मरने वालों की संख्या के बारे में छिपाने की कोशिश कर रही है. कोरोना की स्थिति के बारे में केंद्रीय स्वास्थ्य और गृह मंत्रालय द्वारा रोजाना प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया को जानकारी दी जाती थी, लेकिन 11 मई से ये प्रेस कांफ्रेस भी बंद कर दी गयी है. मशहूर पत्रकार रवीश कुमार ने भी इस पर सवाल उठाया है.

रवीश कुमार ने अपने फेसबुक अकाउंट पर पूछा है, 11 मई से क्यों बंद है कोविड-19 की प्रेस कांफ्रेंस, 1 लाख संख्या पार हुई उस रोज़ भी नहीं हुई प्रेस कांफ्रेंस.

19 मई को भी स्वास्थ्य मंत्रालय की कोविड-19 पर प्रेस कांफ्रेंस नहीं हुई. 11 मई को आखिरी बार हुई थी. उसके बाद से नियमित प्रेस कांफ्रेंस बंद है. शाम को प्रेस रिलीज आ जाती है जिसे छाप दिया जाता है. एक ऐसे दिन जब कोविड-19 की संख्या एक लाख के पार चली गई स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी प्रेस के सामने ही नहीं आए. क्या सरकार ने इस महामारी से संबंधित सूचनाओं को व्यर्थ मान लिया है? सरकार मान सकती है लेकिन क्या लोगों ने भी मान लिया है? क्या सरकार यह संकेत दे रही है कि जो कहना है कह लीजिए, हम प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेंगे. प्रश्नों के उत्तर नहीं देंगे.

यही नहीं इस महामारी से लड़ने के लिए 29 मार्च को 11 एम्पावर्ड ग्रुप का गठन किया गया था. अभी तक सिर्फ 7 मौकों पर ही एम्पावर्ड ग्रुप के चेयरमैन ने प्रेस को संबोधित किया है. 4 एम्पावर्ड ग्रुप ने प्रेस कांफ्रेंस ही नहीं की है. यही नहीं पहले 7 दिन प्रेस कांफ्रेंस होती थी. अब इसे घटाकर 4 दिन कर दिया गया है. बुधवार, शनिवार और रविवार को प्रेस कांफ्रेंस नहीं होती है. अब तो 11 मई से प्रेस कांफ्रेंस भी नहीं हो रही है. बंद है.

दुनिया भर में कोविड-19 से लड़ाई में प्रेस कांफ्रेंस का अहम रोल है. सूचनाओं की पारदर्शिता ने कमाल का असर किया है. इसलिए कोविड-19 को लेकर होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री के अलावा देश के चोटी के वैज्ञानिक या स्वास्थ्य अधिकारी होते थे. उनकी बातों को गंभीरता से छापा जाता है. वे अक्सर अपने प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से अलग राय व्यक्त करते हैं. अमरीका में ट्रंप एंटनी फाउची की जितनी आलोचना कर लें लेकिन फाउची भी ट्रंप की बातों को काट देते हैं. स्वीडन, न्यूजीलैंड, ताईवान जैसे कई देशों में प्रेस कांफ्रेंस में महामारी और संक्रमण के चोटी के विशेषज्ञ होते हैं.

भारत में हमेशा की तरह प्रश्न उठे कि प्रधानमंत्री मोदी क्यों नहीं प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं, लेकिन जवाब में लगता है कि नियमित प्रेस कांफ्रेंस ही बंद कर दी गई है. हमारी आपकी ज़िंदगी दांव पर है. किसी की नौकरी जा रही है तो किसी की जान. अगर सूचनाओं को लेकर यह रवैया है, इस तरह की लापरवाही और रहस्य को मंजूरी मिल रही है तो फिर जनता ने कुछ और तय कर लिया है. आए दिन टेस्ट से लेकर सैंपल जांच के नियम बदलते रहते हैं. कहीं कोई चर्चा या बहस नहीं होती. आप प्रेस रिलीज़ को लेकर तो बहस नहीं कर सकते. यह बता रहा है कि सूचनाओं को लेकर दर्शकों और पाठकों की औकात कितनी रह गई है। सत्ता की नज़र में उनकी क्या साख रह गई है कि सरकार प्रेस रिलीज़ का टुकड़ा मुंह पर फेंक कर चल देती है.

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