डिप्रेशन से बचने के लिए बच्चों को सफलता से ज्यादा असफलता का सामना करने की सीख देने की जरूरत

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पैगाम ब्यूरोः बॉलीवुड स्टार सुशांत सिंह राजपूत की आकस्मिक मौत ने हर किसी को झझकोर कर रख दिया है. साथ ही ये बहस भी होने लगी है कि क्या किसी इंसान के जेहन पर डिप्रेशन (अवसाद) इतना घर कर लेता है कि वो तमाम कामयाबियों और उज्जवल भविष्य के बावजूद अपनी जिंदगी को खत्म करने जैसा संगीन कदम उठा सकता है.

इस मुद्दे पर दुनिया भर के विशेषज्ञ अपनी-अपनी राय दे रहे हैं. इन सबके बीच समाजसेवी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एलाइंस क्लब इंटरनेशनल 101 डिस्ट्रिक्ट एलाई रविशंकर अग्रवाल ने कहा है कि हर इंसान की अपनी सोच है अपने विचार हैं. पर मेरा मानना हैं कि जिस पर हमारा मालिकाना अधिकार नहीं हैं उसको हमें छीनने का कोई अधिकार नहीं हैं, क्योंकि जीवन पर हमारा अधिकार है ही नहीं ये या तो ऊपर वाले या जीवंत भगवान माता-पिता की देन है.

उन्होंने कहा कि मैं मानता हूँ कि ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं, जब सारे रिश्ते बेगाने से लगते हैं. ऐसा महसूस होता हैं कि हर कोई शक की नज़र से देख रहा है. अपनों का तो क्या कहना, शरीर का कपड़ा भी बैरी लगने लगता है.

हमें कुछ नहीं दिखता हम अपनी समस्या में इतना उलझ कर रह जाते हैं कि जीवन में अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देने लगता है, लेकिन तब भी एक ही बात सोचनी चाहिए जिस को हम बना नहीं सकते उसको ख़त्म करने का भी हमें कोई अधिकार नहीं हैं.

रविशंकर अग्रवाल ने कहा कि ये प्रवृत्ति दो कारणों से आती है एक जिदंगी की कड़वी सच्चाईयों से भागना और असफलता का सामना नहीं करने की हिम्मत. और दूसरा सफलता के शिखर से गिर कर असफलता का सामना करने का डर.

इस लिए मेरा मानना है कि हमें बच्चों कों जीवन में सफल होने से ज़्यादा असफलता का सामना करने की ताक़त सिखानी चाहिए, क्योंकि कब वैश्विक संकट आयेगा, कब कोई असाध्य बीमारी से ग्रसित होंगे. कब कौन सा अवसाद घेरेगा. कब जीवन तनावपूर्ण होगा किसी को नहीं मालूम.

उन्होंने कहा कि सफलता हमें ख़ुशी तो देती हैं पर वो एक कमज़ोर शिक्षक है. वही असफलता हमें निराश तो करती है पर एक अच्छी शिक्षक हैं क्योंकि असफलता का सामना करके सफल होने पर जो ख़ुशी और शांति मिलती है उसका वर्णन करना मुश्किल है.

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