जिस देश में शर्मनाक हद तक भुखमरी है, उस देश में सबसे ज्यादा बहसें धार्मिक झगड़ों पर क्यों?

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पैगाम ब्यूरोः जिस देश में अनाज भंडार बफर स्टॉक से तीन गुना ज्यादा है, उस देश में करोड़ों बच्चे कुपोषित क्यों हैं?
जिस देश में शर्मनाक हद तक भुखमरी है, उस देश में सबसे ज्यादा बहसें धार्मिक झगड़ों पर क्यों होती हैं?

उन करोड़ों बच्चों का क्या भविष्य है जो कुपोषण का शिकार हैं? क्या ये धार्मिक झगड़ों से छोटा मुद्दा है?

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका, म्यांमार वगैरह से काफी पीछे है. 107 देशों की इस लिस्ट में भारत 94 नंबर पर है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 14 फीसदी जनसंख्या कुपोषण का शिकार है. 37.4 फीसदी बच्चे उम्र के लिहाज से ठिगने और भयानक कुपोषित हैं.

बौराये हुए समाज को अपने जीवन की असली समस्याओं से कोई वास्ता नहीं होता. वह एक काल्पनिक दुश्मन गढ़ता है और उसी से लड़ता रहता है.

पिछले साल ही नीति आयोग ने रिपोर्ट दी थी कि यूपी में पांच साल की उम्र के हर तीसरे बच्चे का वजन औसत से कम है. यह पांच साल तक के कुल बच्चों की संख्या का 37 फीसदी है. करीब 39 फीसदी बच्चे ठिगनेपन का शिकार हैं.

रिपोर्ट में कहा गया कि 12 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण का शिकार हैं. लड़कों की अपेक्षा लड़कियां ज्यादा कुपोषित हैं. चार साल की उम्र के 43 फीसदी बच्चों में खून की कमी है.

दूध में यूरिया और डिटर्जेंट मिला कर बेचने वाला समाज इस पर बात नहीं करता कि उसके आधे बच्चे कुपोषित ओर ऐनेमिक हैं. बाजार में बड़े बड़े ब्रांड के जो दूध बिक रहे हैं उनमें से करीब 34 फीसदी दूध ख़राब क्वालिटी के हैं.
लेकिन हम लोगों की इन मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं है.

कुपोषितों की फौज लेकर हम विश्वगुरु बनने निकले तो हैं, लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य क्या है?

देश के दो राज्य यूपी और बिहार में सबसे ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं. क्या आपने कभी सुना है कि इन राज्यों में कुपोषण, शिक्षा, मेडिकल, भोजन या रोजगार चुनावी मुद्दा बना हो? ऐसा इसलिए है क्योंकि जनता खुद इन मुद्दों पर गंभीर नहीं है.

(साभार पत्रकार कृष्णकांत के फेसबुक वॉल से संग्रहित)

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